कथन

श्रुतियों के अभिव्यंजन की अब, प्रथा नहीं है ऐ हमदम...।
...“निश्छल”

17 January 2020

ऐ हमदम...

ऐ हमदम...
✒️
मन के मनके, मन के सारे, राज गगन सा खोल रहे हैं
अंधकार के आच्छादन में, छिप जाने से क्या हमदम..?

शोणित रवि की प्रखर लालिमा
नभ-वलयों पर तैर रही है,
प्रातःकालिक छवि दुर्लभ है
शकल चाँद की, गैर नहीं है।

किंतु, चंद ये अर्थ चंद को, स्वतः निरूपित करने होंगे
श्रुतियों के अभिव्यंजन की अब, प्रथा नहीं है ऐ हमदम...।

छवि की छवि, छवि से परिभाषित
मानक कुछ ऐसे निश्चित हैं,
सोलह आने छवि निर्मल हो
मगर, विभूषित अत्यंचित हैं।

आभूषण का मेल नहीं यदि, सौम्य नहीं गर संरचना हो
संज्ञाओं के जप करने की, नहीं महत्ता है हमदम...।
...“निश्छल”

15 January 2020

अर्भागमन

अर्भागमन
✒️
तौर बदल रहा सूर्य का, उत्तर गति उनको भाया है,
हेमंत ऋतु अब अंत समय पर, ऋतु बसंत नियराया है;
शिशिर जाग रहा है लेकर, करवट अपने पहचान की,
आस्वादन, जग-आँखें करतीं, कुहरे के अवसान की।
खुली हुई आँखें धरती की, श्वेत चाँदनी देखेंगीं,
प्रीति बढ़ेगी नील गगन से, अर्क किरण भी खेलेंगीं;
बातें करेंगे, आसमान से, नित्य सुबह और शाम हम,
कागज की पतंग बनाकर, भेजेंगे निज अरमान हम।

बातें, नित होंगीं सूरज से, हँसी ठहाके मारेंगे,
पतंग बना कागज की, उस पर अपने रंग उतारेंगे;
मुस्कानों के चित्र भरेंगे, कागज के ऊपर रंगों में,
पूँछ बड़ी सी बना, बाँध, उसको धागे सतरंगों में।
सूरज होगा मीत सरीखा, अपनी बात बतायेंगे,
लिख पतंग पर अपनी बातें, सूरज तक पहुँचायेंगे;
सूरज तुम भर देना अपने, अरमानों के रंगों को,
खुशी बिखेर देना पतंग पर, पाऊँ ऐसे ढंगों को।
...“निश्छल”
रचनाकाल-२०१८

17 December 2019

यह विनाश की लीला

यह विनाश की लीला
✒️
क्या, मज़हब में डूब चुके हो?
या, रवि हर पल तुम्हें सताता?
या तारक, स्वच्छंद गगन में
जीवन अपना स्वतः बिताता?

शीतलता से भ्रांति बाँटते,
हे रजनीकर! बोध गहो तुम
मज़हब रूपी दीवारें ये, मानवता की फाँस बनेंगीं।
मेरा ही घर नहीं, तुम्हारे, अपनों का भी ग्रास करेंगीं।।

प्रकट हुआ हर जीव धरा पर
हाँ! स्वयंसिद्ध उपभोगी है,
खग-मृग, दाव, गगन, गिरि, सरिता
ये सब के सब उपयोगी हैं।

सभी जीव की प्रथम जरूरत
स्वतंत्रता प्यारी तारों को
पराधीनता की वाणी यह, अपनों में संत्रास भरेगी।
मेरा ही घर नहीं, तुम्हारे, अपनों का भी ग्रास करेगी।।

घोर रुष्टता की यह प्रहरें
जिनमें अहि सा झूल रहे हो,
क्या अपने कर्तव्य वहन को
मानव के सम भूल गये हो?

सत्कर्मों से उदासीनता
अकर्मण्य कर देगी, चंदा!
यह विनाश की लीला, नभ का, धरा संग में नाश करेगी।
मेरा ही घर नहीं, तुम्हारे, अपनों का भी ग्रास करेगी।।
...“निश्छल”

14 December 2019

तारों का आगार

तारों का आगार
✒️
पतली पगडंडी से होकर, झुरमुट के उस पार।
थोड़ा आगे, पार क्षितिज के, तारों का आगार।।

कहीं हम बैठ किनारे पर रच लेंगे
नन्हा-प्यारा गीत,
नीतियाँ, जो भी कहती इस दुनिया की
हमको क्या है मीत?
कि हमको जाना है पैदल ही चलकर, पगडंडी के पार।
बहारें बिछी मिलेंगीं, उन राहों पर, तारों का आगार।।

मगन हो अपनी धुन में बात करेंगे
हो-होकर लवलीन,
मधुर संगीतों के गुंजन श्रुतियों में
कर देंगे तल्लीन।
सुनाई देगी भौंरों के गुंजन की, भीनी सी झंकार।
सुरों में गात झूमते होंगे, ऊपर, तारों का आगार।।

मशीनीकृत जीवन में शांति ढूँढने
सरिताओं के कूल,
वनस्पति से लिपटाते मिल जाएँगे
वे बरसाती फूल।
सभी सांसारिक बंधन का कर देंगे, स्वेच्छा से परिहार।
बनायेंगे अपनी दुनिया, जिसमें हो, तारों का आगार
...“निश्छल”

13 December 2019

बहिष्कृत

बहिष्कृत
✒️
आज, जंगल से बहिष्कृत, हो गए हैं रीछ सारे
दुश्मनी, वनराज को थी, शक्तिशाली हाथियों से।

दो दिनों से गीदड़ों ने, माँद, छोड़ी भी नहीं थी।
वनबिलावों के घरों में, एक कौड़ी भी नहीं थी।।
बिलबिलाते चेहरों पर, थी मगर यह बात अंकित।
भंग है इंसानियत की, साख कुछ ही जातियों से।।
दुश्मनी, वनराज को थी...

वे, सरल, सुकुमार थे जो, शाक था आहार जिनका।
निश्चयी अब हो चुके हैं, भक्ष्य होगा घास-तिनका।।
किंतु, यह आरोप तय था, कुंजरों के शाह के सिर।
है बड़ा जोखिम यहाँ पर, शांति के कुछ साथियों से।।
दुश्मनी, वनराज को थी...

छद्म उत्पातों भरा जग, छल, छली से हार जाता।
जो यहाँ सद्भाव रखता, जीवनीभर मात खाता।।
उष्ट्र, निज पुरुषार्थ के बल, हो गया बंधक सदा को।
तेंदुओं के शीश मिलते, सिंधु वाली घाटियों से।।
दुश्मनी, वनराज को थी...

आँसुओं से तरबतर थे, पादपों के पात सारे।
लौट आएँगे पुराने, इन दरख़्तों के सहारे।।
जंगलों के छोर तक यह, इक मुनादी हो गयी थी।
स्वस्थ रखना है चमन को, क्रूर-घातक घातियों से।।
दुश्मनी, वनराज को थी, शक्तिशाली हाथियों से।।
...“निश्छल”