कथन

श्रुतियों के अभिव्यंजन की अब, प्रथा नहीं है ऐ हमदम...।
...“निश्छल”

17 January 2020

ऐ हमदम...

ऐ हमदम...
✒️
मन के मनके, मन के सारे, राज गगन सा खोल रहे हैं
अंधकार के आच्छादन में, छिप जाने से क्या हमदम..?

शोणित रवि की प्रखर लालिमा
नभ-वलयों पर तैर रही है,
प्रातःकालिक छवि दुर्लभ है
शकल चाँद की, गैर नहीं है।

किंतु, चंद ये अर्थ चंद को, स्वतः निरूपित करने होंगे
श्रुतियों के अभिव्यंजन की अब, प्रथा नहीं है ऐ हमदम...।

छवि की छवि, छवि से परिभाषित
मानक कुछ ऐसे निश्चित हैं,
सोलह आने छवि निर्मल हो
मगर, विभूषित अत्यंचित हैं।

आभूषण का मेल नहीं यदि, सौम्य नहीं गर संरचना हो
संज्ञाओं के जप करने की, नहीं महत्ता है हमदम...।
...“निश्छल”

9 comments:

  1. आपकी रचना निःशब्द कर जाती है।
    अति सुंदर,सराहनीय साहिती सृजन अमित जी।

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    1. सधन्यवाद आभार श्वेता जी। बहुत दिनों के बाद आज कलम चली है, आपकी पंक्तियाँ निश्चित रूप से आशीषों के समान फलित होंगींं। शुभरात्रि।

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार (१९-०१ -२०२०) को "लोकगीत" (चर्चा अंक -३५८५) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    -अनीता सैनी

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  3. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति ,सादर नमन

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  4. बहुत सुन्दर !
    वैसे आज का ज़माना तो बनावट का है. पीतल पर सोने का परत या उस पर सोने का पानी चढ़ाने की कला ही यत्र-तत्र-सर्वत्र दिखाई देती है.

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  5. बहुत सुन्दर

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  6. शोणित रवि की प्रखर लालिमा
    नभ-वलयों पर तैर रही है,
    प्रातःकालिक छवि दुर्लभ है
    शकल चाँद की, गैर नहीं है।

    अहा हा.. शब्द शब्द निशब्द कर रहा है... 👌 👌 👌 👌 बेहतरीन सृजन

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  7. बहुत सुंदर सृजन

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